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व्रत कथा

Pradosh Vrat

Shiv kripa ka shubh muhurat - Pradosh Vrat

महत्व

प्रदोष व्रत प्रत्येक माह की त्रयोदशी तिथि को शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षों में रखा जाता है, अर्थात यह महीने में दो बार आता है और भगवान शिव को समर्पित है। मान्यता है कि इस दिन सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में भगवान शिव कैलाश पर्वत पर आनंद तांडव करते हैं, इसलिए इस समय की गई पूजा से समस्त पापों का नाश होकर सुख, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह व्रत वार अनुसार भी अलग-अलग फल देने वाला माना जाता है, जैसे सोम प्रदोष, भौम प्रदोष आदि।

व्रत विधि

प्रदोष व्रत की पूजा का सबसे महत्वपूर्ण समय 'प्रदोष काल' है, जो सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पहले शुरू होकर सूर्यास्त के बाद लगभग 45 मिनट तक रहता है - यानी दिन और रात्रि के संधिकाल का यह मुहूर्त भगवान शिव की पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

  • त्रयोदशी तिथि के दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूरे दिन उपवास का संकल्प लें।
  • दिनभर निर्जल या फलाहार व्रत रखें; जल, फल और दूध ग्रहण किया जा सकता है।
  • सायंकाल सूर्यास्त से पहले पुनः स्नान करें और शुद्ध वस्त्र पहनकर पूजा स्थल की तैयारी करें।
  • प्रदोष काल शुरू होने पर शिवलिंग या शिव परिवार की प्रतिमा को गंगाजल, दूध, दही, शहद, घी और शक्कर से पंचामृत स्नान कराएं।
  • इसके बाद शुद्ध जल से अभिषेक करें और शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा, भांग, सफेद पुष्प और चंदन अर्पित करें।
  • धूप-दीप जलाकर 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप करें और शिव चालीसा या प्रदोष स्तोत्र का पाठ करें।
  • प्रदोष व्रत कथा का श्रवण या पाठ अवश्य करें, इसके बिना व्रत अधूरा माना जाता है।
  • पूजा के अंत में शिव जी की आरती करें और भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना करें।
  • पूजा के पश्चात प्रसाद ग्रहण कर सकते हैं, परंतु कई भक्त पूर्ण उपवास रखकर अगले दिन सूर्योदय के बाद ही पारण करते हैं।
  • संभव हो तो इस दौरान शिव मंदिर जाकर दर्शन-पूजन करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।

व्रत कथा

प्राचीन समय में एक गरीब ब्राह्मणी अपने पुत्र के साथ रहती थी। उसका पति नहीं था और घर की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। प्रतिदिन वह भिक्षा मांगकर अपना और अपने पुत्र का पेट भरती थी। एक दिन भिक्षाटन करते समय उसे मार्ग में एक घायल एवं दुखी राजकुमार मिला, जो किसी शत्रु के आक्रमण के कारण अपना राज्य खोकर भटक रहा था। ब्राह्मणी को उस पर दया आई और वह उसे अपने घर ले आई तथा पुत्र के समान उसका पालन-पोषण करने लगी।

कुछ समय पश्चात वहाँ ऋषि शांडिल्य का आगमन हुआ। ब्राह्मणी ने ऋषि से अपने और राजकुमार के दुखों के निवारण का उपाय पूछा। ऋषि शांडिल्य ने उन्हें प्रदोष व्रत के विषय में बताया और कहा कि त्रयोदशी तिथि को प्रदोष काल में भगवान शिव की विधिवत पूजा करने से समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं और खोया हुआ सम्मान, राज्य तथा सुख पुनः प्राप्त होता है। ऋषि के कहने पर ब्राह्मणी और राजकुमार दोनों ने पूर्ण श्रद्धा और नियम के साथ प्रदोष व्रत करना आरंभ किया।

व्रत के प्रभाव और भगवान शिव की कृपा से एक दिन राजकुमार की भेंट गंधर्वराज की कन्या से हुई और दोनों का विवाह संपन्न हुआ। गंधर्वराज की सहायता से राजकुमार ने अपनी सेना तैयार की और अपने शत्रुओं को पराजित कर अपना खोया हुआ राज्य पुनः प्राप्त कर लिया। इस प्रकार भगवान शिव के आशीर्वाद से न केवल राजकुमार को उसका राज्य वापस मिला, बल्कि उस दयालु ब्राह्मणी के भी सभी दुख दूर हो गए और उसे भी सम्मान और सुख की प्राप्ति हुई।

इसी कथा के आधार पर यह मान्यता स्थापित हुई कि जो भी भक्त सच्ची श्रद्धा और नियम के साथ प्रदोष व्रत करता है तथा प्रदोष काल में भगवान शिव का पूजन-अभिषेक करता है, भोलेनाथ उसके सभी संकट हर लेते हैं, खोया हुआ सुख-सम्मान लौटाते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि तथा शांति प्रदान करते हैं। तभी से श्रद्धालु प्रत्येक माह दोनों पक्षों की त्रयोदशी को विधिपूर्वक यह व्रत करते आ रहे हैं।

नियम

  • व्रत वाले दिन तामसिक भोजन, प्याज, लहसुन और मांस-मदिरा का पूर्णतः त्याग करें।
  • पूजा प्रदोष काल में ही करें - सूर्यास्त से पूर्व और पश्चात के संधिकाल को न चूकें, यही व्रत का मूल आधार है।
  • शिवलिंग पर हल्दी, कुमकुम और तुलसी पत्र अर्पित न करें, शास्त्रों में इसका निषेध है।
  • व्रत के दिन क्रोध, झूठ और वाद-विवाद से दूर रहकर मन को शांत एवं संयमित रखें।
  • दिनभर उपवास रखते हुए संभव हो तो निर्जल व्रत करें, अन्यथा फल और दूध का ही सेवन करें।
  • व्रत के दौरान काले वस्त्र धारण करने से बचें, सफेद या हल्के रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है।
  • पूजा से पहले और बाद में शारीरिक व मानसिक पवित्रता का विशेष ध्यान रखें।
  • जरूरतमंदों को यथाशक्ति दान करें, विशेषकर सफेद वस्त्र, दूध या तिल का दान शुभ फलदायी है।
  • प्रदोष व्रत कथा का श्रवण अवश्य करें, इसके बिना व्रत का पूर्ण फल नहीं मिलता।

Aur Vrat Katha