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व्रत कथा

Teej Vrat

Teej Vrat - Suhaag, Prem aur Shraddha ka Parv

महत्व

तीज व्रत सावन के पवित्र महीने में मनाया जाने वाला एक प्रमुख पर्व है, जो विशेष रूप से विवाहित स्त्रियाँ अपने पति की लंबी आयु, सुखी दांपत्य जीवन और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखती हैं। यह व्रत माता पार्वती और भगवान शिव के मिलन की स्मृति में मनाया जाता है, जब देवी पार्वती ने कठोर तपस्या करके शिवजी को पति रूप में प्राप्त किया था। कुँआरी कन्याएँ भी इस व्रत को मनचाहा वर पाने की कामना से करती हैं, इसलिए यह व्रत प्रेम, समर्पण और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है।

व्रत विधि

तीज व्रत की विधि में निर्जला या फलाहारी उपवास के साथ माता पार्वती और भगवान शिव की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। इस व्रत को विशेष श्रद्धा और नियमों के साथ संपन्न किया जाता है:

  • व्रत से एक दिन पहले यानी तीज की पूर्व संध्या पर सुहागिनें अपने हाथों में मेहंदी लगाती हैं और घर की साफ-सफाई कर पूजा स्थान को सजाती हैं।
  • तीज के दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करें और नए या हरे रंग के वस्त्र धारण करें, क्योंकि हरा रंग सुहाग और श्रृंगार का प्रतीक माना जाता है।
  • सोलह श्रृंगार करें जिसमें चूड़ियाँ, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी और गहने शामिल हों, यह श्रृंगार माता पार्वती को समर्पित माना जाता है।
  • घर के आंगन या पूजा स्थान पर मिट्टी या बालू से शिव-पार्वती की प्रतिमा बनाएं या बाजार से लाई गई प्रतिमा स्थापित करें।
  • शिव-पार्वती की प्रतिमा को चौकी पर स्थापित कर उसके ऊपर केले के पत्तों या फूलों से मंडप सजाएं।
  • धूप, दीप, अक्षत, रोली, कुमकुम, बेलपत्र, धतूरा, भांग और सफेद-लाल फूल अर्पित करें।
  • सुहाग की सामग्री जैसे चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, कंघी, आलता आदि माता पार्वती को अर्पित करें और बाद में इन्हें सुहागिन स्त्रियों में बांटें।
  • दिनभर निर्जला व्रत रखें, यदि स्वास्थ्य अनुमति न दे तो फलाहार या दूध का सेवन कर व्रत रखा जा सकता है।
  • संध्या समय झूला झूलना, सावन के गीत गाना और सामूहिक रूप से तीज माता की कथा सुनना इस पर्व की विशेष परंपरा है।
  • रात्रि में चंद्रोदय के पश्चात या अगले दिन प्रातः शिव-पार्वती की आरती कर व्रत का पारण करें।
  • पंडित या घर के बड़े-बुजुर्गों से आशीर्वाद लेकर व्रत कथा का श्रवण अवश्य करें, इससे व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

व्रत कथा

प्राचीन कथा के अनुसार, देवी पार्वती ने अपने पूर्वजन्म में हिमालय राज की पुत्री के रूप में जन्म लिया था और बचपन से ही वे भगवान शिव को अपना पति मानकर उनकी आराधना में लीन रहती थीं। उनकी यह इच्छा थी कि जीवनभर के लिए उन्हें भगवान शिव ही पति स्वरूप प्राप्त हों। परंतु हिमालय राज ने बिना पार्वती जी की इच्छा जाने नारद मुनि के परामर्श से उनका विवाह भगवान विष्णु से तय कर दिया। यह जानकर पार्वती जी अत्यंत दुखी हुईं और उन्होंने अपनी सखी के माध्यम से पिता को अपने मन की बात बताई, परंतु पिता अपने निर्णय पर अडिग रहे।

तब पार्वती जी अपनी सखियों के साथ घने वन में चली गईं और वहाँ उन्होंने कठोर तपस्या आरंभ की। उन्होंने वर्षों तक निराहार रहकर, कभी पत्ते खाकर तो कभी पूर्णतः निर्जल रहकर भगवान शिव की आराधना की। उन्होंने रेत से शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा की और घोर तप से अपने शरीर को कृश कर लिया। उनकी इस अटूट भक्ति और तपस्या को देखकर स्वयं भगवान शिव प्रसन्न हो गए और उन्होंने पार्वती जी को दर्शन देकर वर मांगने को कहा। पार्वती जी ने विनम्रतापूर्वक कहा कि यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो मुझे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करें।

भगवान शिव ने पार्वती जी की तपस्या और प्रेम को स्वीकार करते हुए विवाह का प्रस्ताव रखा और स्वयं हिमालय राज के पास जाकर पार्वती जी का हाथ मांगा। इस प्रकार सावन माह की तृतीया तिथि को भगवान शिव और माता पार्वती का पुनर्मिलन हुआ और यही दिन आगे चलकर तीज पर्व के नाम से प्रसिद्ध हुआ। मान्यता है कि इसी दिन से माता पार्वती ने समस्त सुहागिन स्त्रियों को वरदान दिया कि जो भी नारी सच्चे मन से इस दिन व्रत रखकर शिव-पार्वती की आराधना करेगी, उसका सुहाग अखंड रहेगा और उसे मनचाहा वर या सुखी दांपत्य जीवन प्राप्त होगा। तभी से सुहागिनें और कुँआरी कन्याएँ श्रद्धापूर्वक तीज का व्रत रखती आ रही हैं।

नियम

  • व्रत के दिन क्रोध, वाद-विवाद और नकारात्मक विचारों से दूर रहें, मन को शांत और पवित्र रखें।
  • निर्जला व्रत रखने वाली महिलाओं को अत्यधिक परिश्रम से बचना चाहिए और आराम को प्राथमिकता देनी चाहिए।
  • व्रत के दौरान काले या सफेद वस्त्र धारण न करें, हरे, लाल या पीले रंग के वस्त्र शुभ माने जाते हैं।
  • तामसिक भोजन, लहसुन-प्याज और मांसाहार का सेवन पूर्णतः वर्जित है।
  • सुहागिनें व्रत के दिन बिना श्रृंगार के न रहें, यह अशुभ माना जाता है।
  • घर में साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें और पूजा स्थान को स्वच्छ रखें।
  • व्रत का पारण करने से पहले शिव-पार्वती की कथा अवश्य सुनें या पढ़ें।
  • व्रत के दौरान झूठ बोलने, किसी का अपमान करने या ईर्ष्या भाव रखने से बचें।
  • बिना डॉक्टर की सलाह के गर्भवती, बीमार या अस्वस्थ महिलाओं को निर्जला व्रत नहीं रखना चाहिए, वे फलाहार कर सकती हैं।
  • व्रत के दिन बाल कटवाना, नाखून काटना या शुभ कार्यों को टालना वर्जित माना जाता है।

Aur Vrat Katha