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व्रत कथा

Karva Chauth Vrat

Fasting for prosperity and marital devotion

महत्व

करवा चौथ व्रत विवाहित स्त्रियाँ अपने पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए रखती हैं, यह कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन स्त्रियाँ सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक निर्जला व्रत रखती हैं और रात को चंद्रमा को अर्घ्य देकर ही अन्न-जल ग्रहण करती हैं। यह व्रत पति-पत्नी के प्रेम, त्याग और विश्वास का प्रतीक माना जाता है और उत्तर भारत में विशेष रूप से बड़ी श्रद्धा से मनाया जाता है।

व्रत विधि

करवा चौथ व्रत की तैयारी एक दिन पहले से शुरू हो जाती है और पूरे दिन कई महत्वपूर्ण चरणों में विधि-विधान से पूजा की जाती है।

  • व्रत से एक दिन पहले सास या घर की बड़ी महिला द्वारा बहू को सरगी दी जाती है, जिसमें फल, मिठाई, मठरी और श्रृंगार का सामान होता है।
  • व्रत वाले दिन सूर्योदय से पहले ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सरगी ग्रहण करें, क्योंकि इसके बाद पूरे दिन निर्जला व्रत रखा जाता है।
  • सरगी खाने के बाद स्नान करके संकल्प लें कि पूरे दिन बिना अन्न-जल ग्रहण किए व्रत रखेंगी।
  • दिनभर घर की साफ-सफाई और पूजा की तैयारी करें, शाम की पूजा के लिए करवा (मिट्टी का लोटा), छलनी, दीपक और पूजा थाली तैयार रखें।
  • शाम को सुहागिनें सोलह श्रृंगार करती हैं - लाल या पारंपरिक रंग की साड़ी, मेहंदी, बिंदी, चूड़ियाँ, सिंदूर आदि धारण करती हैं।
  • शाम के समय सभी महिलाएँ एक स्थान पर एकत्रित होकर मां पार्वती, भगवान शिव, कार्तिकेय और गणेश जी की पूजा करती हैं।
  • पूजा की थाली में करवा, दीपक, रोली, चावल, मिठाई और फल सजाएं। करवे में जल भरकर उसके ऊपर दीपक रखा जाता है।
  • पंडित या घर की बुजुर्ग महिला द्वारा करवा चौथ की कथा सुनाई जाती है, सभी महिलाएँ चावल के दानों को एक हाथ से दूसरे हाथ में बदलते हुए ध्यानपूर्वक कथा सुनती हैं।
  • चंद्रोदय के समय चंद्रमा के दर्शन करें, छलनी से पहले चंद्रमा को और फिर उसी छलनी से अपने पति का चेहरा देखें।
  • चंद्रमा को जल और अर्घ्य अर्पित करें, फिर पति के हाथों से पानी पीकर और मिठाई खाकर व्रत का पारण करें।
  • पति अपनी पत्नी को उपहार देकर और आशीर्वाद देकर स्नेह प्रकट करते हैं, जिसके बाद परिवार सहित भोजन किया जाता है।

व्रत कथा

करवा चौथ व्रत की सबसे प्रचलित कथा वीरवती नामक एक साहूकार की सुंदर और इकलौती बहन की है, जो अपने सात भाइयों की अत्यंत लाड़ली थी। विवाह के बाद अपने पहले करवा चौथ व्रत के दिन वीरवती ने भी अपने पति की लंबी आयु के लिए निर्जला व्रत रखा। दिनभर भूख-प्यास से व्याकुल होकर वह बहुत कमजोर हो गई और शाम होते-होते उसकी हालत बिगड़ने लगी। यह देखकर उसके सातों भाई अपनी बहन का कष्ट सहन न कर सके।

भाइयों ने एक युक्ति निकाली - उन्होंने पीपल के पेड़ के पीछे एक बड़ा दर्पण रखकर और छलनी में दीपक जलाकर यह भ्रम पैदा कर दिया कि चंद्रमा उग आया है। भोली वीरवती ने अपने भाइयों की बात मानकर उसे सच्चा चंद्रमा समझ लिया, अर्घ्य दिया और व्रत खोलकर भोजन कर लिया। परंतु जैसे ही उसने पहला निवाला मुँह में रखा, उसे छींक आई और दूसरे निवाले में बाल निकला, तीसरे निवाले में ही उसके पति की मृत्यु का समाचार आ गया। वीरवती यह सुनकर बिलख-बिलखकर रोने लगी, उसे समझ आ गया कि यह छल के कारण हुआ है क्योंकि उसने असली चंद्रोदय से पहले ही व्रत खोल लिया था।

उसी समय वहाँ इंद्र की पत्नी इंद्राणी प्रकट हुईं। वीरवती ने उनसे विनती की और अपनी भूल के लिए क्षमा माँगते हुए अपने पति को पुनर्जीवित करने का उपाय पूछा। इंद्राणी ने कहा कि तुमने चंद्रमा को असली अर्घ्य दिए बिना व्रत खोल दिया था, इसलिए यह परिणाम भुगतना पड़ा। उन्होंने वीरवती को विधिपूर्वक करवा चौथ का व्रत पुनः रखने और सच्ची श्रद्धा से चंद्रमा की पूजा करने की सलाह दी। वीरवती ने अगले वर्ष अत्यंत निष्ठा और श्रद्धा से पूरे विधि-विधान के साथ करवा चौथ का व्रत किया और चंद्रोदय होने पर विधिपूर्वक अर्घ्य देकर व्रत खोला।

उसकी सच्ची भक्ति और पतिव्रता धर्म के प्रभाव से उसका पति पुनः जीवित हो उठा। तभी से यह मान्यता चली आ रही है कि करवा चौथ का व्रत विधि-विधान और पूर्ण श्रद्धा से, बिना चंद्रोदय से पहले अन्न-जल ग्रहण किए रखा जाए तो पति की आयु लंबी होती है और दांपत्य जीवन सुखी रहता है।

नियम

  • व्रत वाले दिन सूर्योदय से पहले सरगी ग्रहण करने के बाद पूरे दिन अन्न-जल ग्रहण न करें।
  • चंद्रमा को अर्घ्य देकर छलनी से चंद्र दर्शन और पति का मुख देखे बिना व्रत न खोलें।
  • व्रत के दिन काले, सफेद या भूरे रंग के वस्त्र पहनने से बचें, लाल, गुलाबी या पारंपरिक शुभ रंग पहनें।
  • पति-पत्नी के बीच किसी भी प्रकार का वाद-विवाद या कटु वचन इस दिन न हों।
  • व्रत के दौरान तेज या कठोर स्वभाव, क्रोध और नकारात्मक विचारों से बचें।
  • घर में सुई-धागे का प्रयोग या सिलाई-कढ़ाई का कार्य इस दिन वर्जित माना जाता है।
  • बाल धोना, नाखून काटना और नुकीली वस्तुओं का प्रयोग टालना चाहिए।
  • करवा चौथ की कथा सुने बिना व्रत अधूरा माना जाता है, इसलिए कथा अवश्य सुनें।
  • व्रत का पारण जल्दबाज़ी में नहीं बल्कि पूर्ण विधि-विधान से ही करें।
  • गर्भवती या अस्वस्थ महिलाएँ चिकित्सक की सलाह अनुसार फलाहार के साथ व्रत रख सकती हैं।

Aur Vrat Katha