आज के दिन क्रूस पर जो सन्नाटा था, वही सबसे बड़ी प्रेम की भाषा थी।
उसकी पीठ पर पड़े कोड़ों ने हमारे घावों को भरने का मार्ग खोल दिया।
क्षमा माँगना आसान नहीं होता, पर उसने बिना माँगे ही सबको क्षमा कर दिया।
गोलगोथा की उस पहाड़ी पर दर्द ने भी घुटने टेक दिए थे, जब प्रेम बोल उठा।
उसने अपने खून से वह कर्ज़ चुकाया, जो हम कभी नहीं चुका सकते थे।
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