ज़िंदगी की चाहत भी कुछ ऐसी रखो— या तो आलिशान महलों तक, या फिर श्मशान तक। — S.S. Rawat
ज़िंदगी की चाहत भी कुछ ऐसी रखो—
या तो आलिशान महलों तक,
या फिर श्मशान तक।
ज़िंदगी की चाहत भी कुछ ऐसी रखो—
या तो आलिशान महलों तक,
या फिर श्मशान तक।