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जहां संविधान की स्याही सूख चुकी है, वहां अब नागरिकों के कर्मों की स्याही से उसे जीवंत रखना है।

जहां संविधान की स्याही सूख चुकी है, वहां अब नागरिकों के कर्मों की स्याही से उसे जीवंत रखना है।

जहां संविधान की स्याही सूख चुकी है, वहां अब नागरिकों के कर्मों की स्याही से उसे जीवंत रखना है।
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