इफ्तार की मेज़ पर जितने ज़्यादा अपने हों, बरकत उतनी ही बढ़ जाती है।
इफ्तार की मेज़ पर जितने ज़्यादा अपने हों, बरकत उतनी ही बढ़ जाती है।
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रोज़ा सिर्फ भूख-प्यास का नाम नहीं, यह सब्र और शुक्र सीखने का सफ़र है।
इस साल दी गई ज़कात ठीक उन्हीं हाथों तक पहुंचे जिन्हें उसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।
May Laylat al-Qadr find you awake, humble, and asking for exactly what your heart truly needs.
सब्र वो साथी है जो रोज़े के हर पल में आपके साथ चलता है, इसे हमेशा थामे रखें।