नई कलम, नई कॉपी, नई शुरुआत — बसंत पंचमी की यही तो पहचान है।
आज के दिन अपने भीतर के कलाकार को भी थोड़ा जगा लीजिए।
बसंत आया है दरवाज़े पर, ज़रा किताबों की धूल तो झाड़िए।
May your questions always outnumber your answers — that's how real learning stays alive.
आपकी बुद्धि का दीप कभी मंद न पड़े, यही आज की कामना है।